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लोकतंत्र की गरिमा के लिए विधायिकाओं में बहस का तथ्य आधारित और सार्थक होना जरूरी : बिरला

नयी दिल्ली।  लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला ने गुरुवार को कहा कि संसद और विधान मंडलों में केवल तर्क, गंभीरता और तथ्यों पर आधारित चर्चाओं से ही लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को सुरक्षित रखा जा सकता है और इसी से इन संस्थाओं के प्रति जनता का विश्वास मजबूत होगा। श्री बिरला ने कहा कि भारत की लोकतांत्रिक संस्कृति का मूल आधार सदैव चर्चा, आम सहमति और गहन विचार-विमर्श रहा है। अतः संसद और राज्यों की विधान सभाओं को सदैव देश की जनता की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करने वाला सर्वोच्च मंच बने रहना चाहिए। वह यहां दिल्ली विधान सभा के ऐतिहासिक कक्ष में केंद्रीय विधान सभा (1924-1930) की कार्यवाही के 89 खंडों के विमोचन और त्रैमासिक पत्रिका ‘विधान-चेतना’ के प्रथम अंक के शुभारंभ के अवसर पर एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। भारत का लोकतंत्र संपूर्ण विश्व के लिए एक मार्गदर्शक बताते हुए लोक सभा अध्यक्ष ने कहा कि भारतीय लोक तंत्र अपने संवाद, सहभागिता और संवैधानिक मूल्यों की समृद्ध परंपराओं के माध्यम से वैश्विक स्तर पर राष्ट्रों को प्रेरित कर रहा है। कार्यक्रम में केंद्रीय संसदीय कार्य एवं अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू, दिल्ली विधान सभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता, दिल्ली सरकार के मंत्री प्रवेश साहिब सिंह और दिल्ली विधान सभा के उपाध्यक्ष मोहन सिंह बिष्ट भी विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थे। श्री बिरला ने इस बात पर विशेष बल दिया कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की वास्तविक शक्ति जागरूक संवाद, तथ्य-परक चर्चा और सक्रिय जनभागीदारी में निहित है। उन्होंने संसदीय विरासत के संरक्षण के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि भावी पीढ़ियों में लोकतांत्रिक चेतना को सुदृढ़ करने के लिए भारत की संसदीय विरासत का संरक्षण और गहन अध्ययन अत्यंत आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि दिल्ली विधान सभा का यह ऐतिहासिक भवन भारत की लोकतांत्रिक चेतना, संसदीय परंपराओं और हमारे स्वतंत्रता संग्राम का एक जीवंत प्रतीक तथा गौरवशाली विरासत है। इस परिसर के ऐतिहासिक महत्व को स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि इस भवन ने भारत के संसदीय लोकतंत्र के प्रारंभिक कालखंड को देखा है। यह एक ऐसा ऐतिहासिक मंच रहा है, जहां देश के स्वतंत्रता सेनानियों और महान राष्ट्रीय नेताओं ने प्रतिनिधित्व, नागरिक अधिकारों और स्वशासन के लिए अपनी मुखर संवैधानिक मांगें उठाई थीं। केन्द्रीय विधानसभा में प्रथम भारतीय अध्यक्ष विट्ठलभाई पटेल के अतुलनीय योगदान का स्मरण करते हुए श्री बिरला ने कहा कि उन्होंने संसदीय शिष्टाचार, निष्पक्षता और अध्यक्ष पद (आसंदी) की गरिमा की एक सुदृढ़ नींव रखी थी। औपनिवेशिक शासन के अत्यंत कठिन समय और भारी दबाव के बावजूद, श्री पटेल ने इस विधायी संस्था की स्वायत्तता और प्रतिष्ठा को अक्षुण्ण रखा। उनका यह योगदान देश भर के पीठासीन अधिकारियों और विधि निर्माताओं को हमेशा प्रेरित करता रहेगा। लोक सभा अध्यक्ष ने कहा कि डिजिटलीकरण , ई-विधानसभा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी उभरती हुई तकनीकें नीति-निर्माण और विधायी शोध को अधिक पारदर्शी, कुशल और सर्व-सुलभ बना रही हैं।

इस ऐतिहासिक अवसर पर लोक सभा अध्यक्ष ने औपचारिक रूप से त्रैमासिक पत्रिका – ‘विधान-चेतना’ के प्रथम अंक के साथ की कार्यवाही के 89 खंडों का विमोचन किया। केंद्रीय विधान सभा की कार्यवाही के प्रकाशन को एक ऐतिहासिक कदम बताते हुए श्री बिरला ने आशा व्यक्त की कि यह संकलन आने वाली पीढ़ियों के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों और संसदीय मर्यादाओं के एक मार्गदर्शक प्रकाश-स्तंभ के रूप में कार्य करेगा। उन्होंने सराहना करते हुए कहा कि दिल्ली विधान सभा ने इन दुर्लभ बहसों और ऐतिहासिक कार्यवाहियों का व्यवस्थित प्रकाशन कर भारत के विधायी इतिहास को सहेजने की दिशा में एक बहुत महत्वपूर्ण शून्यता को भरा है। ‘विधान-चेतना’ की सराहना करते हुए श्री बिरला ने आशा व्यक्त की कि शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और आम नागरिकों की सुविधा के लिए इस ऐतिहासिक कार्यवाही तथा ‘विधान-चेतना’ पत्रिका, दोनों को डिजिटल प्रारूप में भी व्यापक रूप से उपलब्ध कराया जाएगा।