आरोपीू को 55 तारीखों पर पेश न करने पर उच्चतम न्यायालय ने दिये जांच के आदेश

नयी दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने महाराष्ट्र पुलिस द्वारा जमानत सुनवाई के लिए एक आरोपी को 55 तारीखों पर न्यायालय में पेश नहीं करने पर कड़ी आपत्ति जताते हुए राज्य के जेल महानिदेशक को इस मामले की जांच करने और रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया है। पीड़ित को चाकू मारने के मामले में आरोपी शशि उर्फ शाही चिकना विवेकानंद जुरमानी को जमानत देते हुए जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने कहा कि जेल अधिकारियों के इस आचरण से वे “स्तब्ध” हैं। किसी को भी बचाने की कोशिश करने के खिलाफ चेतावनी देते हुए पीठ ने महाराष्ट्र के जेल महानिदेशक को इस मामले की जांच करने और दो महीने के अंदर रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया। मामले को रिपोर्ट की समीक्षा के लिए 3 फरवरी 2026 को सूचीबद्ध किया गया है। पीठ ने कहा, “राज्य अधिकारियों के इस आचरण से हम स्तब्ध हैं।” न्यायालय ने यह भी कहा कि आरोपी को सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष पेश करना न केवल मुकदमे के शीघ्र निस्तारण के लिए जरूरी है, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय भी है ताकि कैदी के साथ कोई दुर्व्यवहार न हो।
पीठ ने कहा, “इस मूलभूत सुरक्षा उपाय का गंभीर उल्लंघन हुआ है, जो चौंकाने वाला और निंदनीय है। हम इसका कड़ा विरोध करते हैं। मामला 15 अक्टूबर 2021 को उल्हासनगर के विठ्ठलवाड़ी थाने में दर्ज एफआईआर से संबंधित है, जिसमें आरोप था कि याचिकाकर्ता और सह-आरोपी उमेश उर्फ ओमी बंसीलाल किशनानी ने मृतक और एक पुलिस कांस्टेबल पर चाकू से हमला किया था। हालांकि बाद में मृतक ने बयान दिया कि याचिकाकर्ता और सह-आरोपी ने उसे केवल मुक्कों और लातों से मारा था। उसने स्पष्ट किया कि पुलिस कांस्टेबल पर चाकू से वार सह-आरोपी नरेश ने किया था। घायल पुलिस कांस्टेबल ने भी किसी का नाम नहीं लिया, सिर्फ आरोपी की शारीरिक बनावट का वर्णन किया। पीठ ने दुख के साथ नोट किया कि समान स्थिति वाले सह-आरोपी को वर्षों पहले जमानत मिल चुकी है, जबकि याचिकाकर्ता चार साल से जेल में है।
याचिकाकर्ता के वकील ने उच्चतम न्यायालय को बताया कि उनके मुवक्किल के खिलाफ कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और वह चार साल से अधिक समय से हिरासत में है, जबकि समान रूप से स्थित सह-आरोपी को पहले ही जमानत मिल चुकी है। यह भी बताया गया कि चल रहे मुकदमे में कुल 85 तारीखों में से 55 तारीखों पर याचिकाकर्ता को अदालत में पेश ही नहीं किया गया। राज्य सरकार ने इन तथ्यों पर कोई विरोध नहीं जताया। पीठ ने महाराष्ट्र के जेल महानिदेशक को “स्वयं जांच” करने, जिम्मेदारी तय करने और कार्रवाई करने का निर्देश दिया। साथ ही चेतावनी दी कि यदि किसी को बचाने या संरक्षण देने की कोशिश हुई तो जेल महानिदेशक को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जाएगा। दो महीने के अंदर व्यक्तिगत हलफनामे के साथ रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया गया है। पीठ ने कहा, “हमें लगता है कि जमानत का मजबूत आधार बनता है।” याचिकाकर्ता को संबंधित अदालत द्वारा निर्धारित शर्तों के अधीन जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया गया।
