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सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षित रखे गए फैसले सुनाने में देरी के लिए उच्च न्यायालयों की खिंचाई की

नयी दिल्ली।  उच्चतम न्यायालय ने सुनवाई पूरी होने के बाद उच्च न्यायालयों द्वारा फैसले सुनाने में की जा रही देरी पर गहरी चिंता व्यक्त की है और इसे “बेहद चौंकाने वाला और आश्चर्यजनक” बताया है। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ 2008 से लंबित एक आपराधिक मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अंतरिम आदेशों को चुनौती देने वाली रवींद्र प्रताप शाही द्वारा दायर अपीलों पर सुनवाई कर रही थी। इस अपील पर 24 दिसंबर, 2021 को सुनवाई पूरी हो चुकी थी और आदेश के लिए सुरक्षित रख लिया गया था, लेकिन कोई फैसला नहीं सुनाया गया, जिससे मामले को दूसरी पीठ के समक्ष रखा गया। शीर्ष अदालत ने कहा कि शीघ्र निपटारे के लिए बार-बार अनुरोध करने के बावजूद उच्च न्यायालय ने कोई फैसला नहीं सुनाया। पीठ ने कल कहा, “यह बेहद चौंकाने वाला और आश्चर्यजनक है कि अपील की सुनवाई की तारीख से लगभग एक साल तक फैसला नहीं सुनाया गया।

न्यायालय ने कहा कि उसे बार-बार ऐसी ही स्थितियों का सामना करना पड़ा है जहाँ सुनवाई पूरी होने के बाद भी महीनों, और कुछ मामलों में तो वर्षों तक, फैसले नहीं सुनाए जाते। अनिल राय बनाम बिहार राज्य मामले में अपने पहले के फैसले का हवाला देते हुए न्यायालय ने दोहराया कि समय पर फैसले सुनाना न्याय प्रदान करने की प्रणाली का एक अनिवार्य हिस्सा है। उच्चतम न्यायालय ने नए निर्देश जारी करते हुए आदेश दिया कि प्रत्येक उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार उन मामलों की सूची वाली एक मासिक रिपोर्ट तैयार करें जिनमें फैसले सुरक्षित रखे गए हैं, लेकिन सुनाए नहीं गए हैं। यह रिपोर्ट संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को प्रस्तुत की जानी चाहिए।

यदि तीन महीने के भीतर फैसला नहीं सुनाया जाता है, तो महापंजीयक को मामले को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करना होगा, जो दो सप्ताह के भीतर फैसला सुनाने का निर्देश देंगे। यदि कोई पीठ फिर भी फैसला नहीं सुनाती है, तो मामले को किसी अन्य पीठ को सौंप दिया जाना चाहिए। पीठ ने स्पष्ट किया, “ये निर्देश इस न्यायालय द्वारा पहले ही जारी किए जा चुके निर्देशों के अतिरिक्त हैं” और अपने आदेश को अनुपालन के लिए सभी उच्च न्यायालयों भेजने का निर्देश दिया।